बच्चा और उसका दिमाग

बच्चा और उसका दिमाग मां-बाप, परिवार और समाज के लिए एक "माल" होता है। सब मिलकर चाहते हैं कि माल का अपना स्वतंत्र वजूद और चिंतन ना हो। कम से कम धर्म और संस्कृति के मामले पर तो वह परिवार और समाज के चिंतन का गुलाम बना रहे। उसके दिमाग में जो ठूँसा जाए उसे वह बिना सवाल किए आखरी सच मानकर स्वीकार कर ले।
  नेह इन्दवर