यौन-हास्य का सच और विज्ञान

विज्ञान न पढ़ने से कैसी हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो जाती है, यह आजकल समाचारों में ठहाके बनकर गूँज रही है। लेकिन सौ ठहाकों पर एकाध दृढ़ स्वर ऐसे भी सुनायी पड़ जाते हैं, जो आँसुओं का मोर के गर्भाधान में योगदान मानते हैं। 
मोर-मोरनी को छोड़िए और आगे चलिए। बीसेक साल पहले एक फ़िल्म आयी थी 'हम दिल दे चुके सनम'। इसमें एक अंतरंग दृश्य में सलमान ऐश्वर्या से रति-निवेदन कर रहे हैं और वे गर्भ ठहरने का ख़तरा बता कर उन्हें मना कर रही हैं। हम लोग उस दृश्य में ठहाके मारकर उस समय हँसे थे, हमारे जैसे बहुत से आज भी हँस रहे हैं। लेकिन प्रश्न बहुत शोचनीय यह है कि हँसने के लिए इतने ख़राब चुटकुले हमें मिल ही क्यों रहे हैं?
हास्य की बुरी विषय-वस्तु उसकी दयनीयता का प्रतिबिम्बन करती है। बौद्धिकों के चुटकुले भी ऊँचे दर्ज़े के होते हैं, जबकि छोटी सोच माँ-बहन की गाली-भर पर खीस निपोर देती है। यौन विषयों पर तो चाहे-अनचाहे लोग हँस दिया करते हैं। इस पोस्ट पर भी मेरे कुछ मित्र ठहाके वाला चिह्न बना सकते हैं। फिर जब बात इतनी मौलिक यौन-अशिक्षा की हो, तब तो बहुत से लोगों को हँसने का मौक़ा मिल जाता है।

तस्वीर डेविएंट आर्ट  से साभार 
छूने पर गर्भ नहीं ठहरता, यह इतना निर्विवाद सत्य नहीं है जितना मैं डॉक्टर होकर मानता हूँ। यह अचम्भा तीर की तरह मुझे तब चुभा जब मैंने जाना कि भारत में किशोर-काल में सेक्स-शिक्षा का स्तर क्या है। मुख-मैथुन व गुदा-मैथुन, जिन्हें क़ानून अवैधानिक और बहुधा लोक अप्राकृतिक मानता है, उनसे भी लोग स्त्री के गर्भ ठहरने से भयभीत रहते हैं। किसी अमुक वस्तु को खा लेने से दिव्य महात्मा-महापुरुष के जन्म की तो ख़ैर कथाएँ ग्रन्थों में बहुश्रुत-बहुपठ हैं ही। 

जो बातें इस तरह के अज्ञान से निकलकर सामने आती हैं:
वंशवृद्धि की क्षमता किस पदार्थ में होती है, यह लोगों को पता नहीं। वीर्य (जिसमें शुक्राणु होते हैं) और अण्डाणु के अलावा संसार का कोई भी पदार्थ अकेले या मिलाने पर किसी को भी कैसे पैदा कर सकता है ?

कुदरत के ये नन्हें तत्त्व हमें तब दिखे, जब हमने माइक्रोस्कोप बना लिया। आप धर्म के आधार पर किसी भी दिव्य दृष्टि की बात करें, लेकिन दिव्य दृष्टियाँ तो दरअसल ये ही हैं। सुदूर स्थिति विशालकाय ग्रहों-तारों को दिखाने वाली दूरदर्शी और समीप सुई की नोक के भी लाखवें हिस्से के बराबर के कीटाणुओं को दिखाने वाली सूक्ष्मदर्शी। ये ही हमें वह सत्य दिखाती हैं जो हमारी आँखों से परे है। जब तक देखेंगे नहीं, मानेंगे नहीं। मानना चाहिए भी नहीं। एक बार शुक्राणु को देख लेंगे, तो जान जाएँगे कि आप पैदा कैसे हुए होंगे। एक बार अण्डाणु का दर्शन कर लेने पर मातृत्व का एककोशिकीय हस्ताक्षर समझ में आ जाएगा।

'जर्म (Germ)' शब्द का अर्थ कीटाणु बाद में बना, पहले वह बीज था। इसी से 'जर्माइनल (Germinal)' और 'जर्मिनेशन (Germination)' निकले। कालान्तर में जब बैक्टीरिया देखे गये, तो एककोशिकीय प्राणी भी बीज-से नज़र आये। बस, फिर उनका नाम भी 'जर्म' पड़ गया।
योनि के रास्ते गर्भाशय या अण्डवाहिनी में पहुँचा वीर्य ही औरत को गर्भिणी कर सकता है। अन्य किसी भी रास्ते यह स्त्री-गर्भाशय तक पहुँच ही नहीं सकता। 


मुँह से, गुदा से, त्वचा पर मलने से या फिर कुछ भी करने से पुरुष के वीर्य का स्त्री-गर्भाशय से सम्पर्क नहीं किया जा सकता। मुँह से ली हुई हर वस्तु को पाचन-तन्त्र में जाना है और पच जाना है। नाक और मुँह के रास्ते ली हुई वस्तु फेफड़ों में भी जानी बहुत हद तक नियत है। इन दोनों तन्त्रों जठर-तन्त्र और श्वसन-तन्त्र का यौनांगों से कोई सम्बन्ध नहीं है। मलद्वार के रास्ते प्रविष्ट वस्तु भी योनि से जुड़े गर्भाशय तक साधारण रूप में नहीं पहुँच सकती, जब तक मलाशय और योनि क्षतिग्रस्त होकर परस्पर जुड़ न जाएँ। 

जो जैविक घटना जिस अंग घटती है, उसके लिए कुदरत ने पूरी तैयारी की है। आमाशय में तेज़ाब है, जो हर शुक्राणु को क्षण भर में नष्ट कर देगा। तमाम पाचक-रस हैं, जिनमें किसी भी का ज़िंदा रहना सम्भव नहीं। श्वसन-तन्त्र वायु के आदान-प्रदान के लिए बनाया गया है। वहाँ एक नन्हा सा जलकण या भोजनकण भी खाँसी पैदा करके यह बताता है कि तुम बाहरी हो, यहाँ तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं। 

स्वतः जीवन की उत्पत्ति जो धर्मग्रन्थों में विविध रूपों में वर्णित है, उसे मानने वाले पूरी दुनिया में थे। आज भी हैं। लेकिन दुनिया में एशिया में यह संख्या अधिक है। कारण कि एशियाई समाज आस्थावान् समाज है। आस्था का सम्बन्ध भावना से है। प्रबल भावना का उद्दीपन ही आस्था का सुदृढ़ीकरण है। ऐसा मुझे महसूस होता है, क्यों होता है पता नहीं। तुम भी मान लो। क्यों माने लें? इसलिए मान लो क्योंकि तुमसे पहले सब मानते आये हैं। प्रश्न मत करो। लक़ीर पर चलते रहो, फ़क़ीर की तरह। 

फ़क़ीरी और सन्तई वृत्ति से सादी हैं, इसलिए स्तुत्य हैं। लेकिन चिन्तन उनमें पुस्तकीय है, रूढ़िवादी है। उनसे प्रश्न किया जाएगा अनुभूति कराने का, तो वे आपकी पात्रता की बात उठा देंगे। आसमान में बृहस्पति ग्रह सबको दिख सकता है, बृहस्पति देवता के दर्शन आस्था ही करा सकती है। रिफ़्लेक्टिंग व रिफ्रैक्टिंग दूरदर्शी आपको मिल जाए, यह सरल है। आस्था तब तक नहीं मिलेगी, जब तक आप इस खेल को समझ न जाएँ। थक-हार कर आप कह ही देंगे, कि हाँ मुझे दर्शन अब होने लगे हैं। 

पुराने लोग गेहूँ और भूसे से चूहों की उत्पत्ति मानते थे, मगरमच्छ उनके अनुसार पानी में तैरते लट्ठों से उत्पन्न हो जाते थे। यह जीव-विज्ञान का क्या, सामान्य विज्ञान का ही अन्धकार-काल था। दर्शन की बातें करने वाले सुकरात, प्लेटो, अरस्तू चाहे कुछ भी कह लें, उन्हें विज्ञान की मोटी-मोटी बातें भी न पता थीं। मगर वह उनका ज़माना था, जब तकनीकी नहीं थी। जब किसी को पता नहीं था कि कोशिका किसे कहते हैं? किसी ने कोशिका देखी ही न थी। मनुष्य के अंगों का प्रत्यक्ष दर्शन ही विरलतम बात थी। तब तालीम का मतलब फ़लसफ़े होता था, जितना ऊँचा कल्पित दर्शन, उतना विद्वान व्यक्ति। बस बात ख़त्म। 

फिर हमारा प्रत्यक्ष ज्ञान बढ़ने लगा। हमने वह देखना-सीखना शुरू किया, जो अब तक केवल कल्पना के सिद्धान्तों पर आधारित था। विज्ञान इसी प्रत्यक्षीरकरण का इन्द्रियजन्य स्वरूप ही तो था ! इन्द्रियजन्य सत्य के प्रति तिरस्कार कैसा? जो दिखता और सुनायी देता है, उसे अधूरा बता कर तिरस्कृत करना क्यों? अनुभवों को अर्ध-सत्य कहते हुए अनुभूतियों की बातों में जनता को उलझाना किस लिए?

अनुभवों को समझे-समझाये बिना जो समाज सीधे अनुभूतियों की बात करता है, उसके भाग्य में ऐसा ही बुरा हास-परिहास आता है। यह हँसी जब थमती है, तो चेहरे पर एक दयनीयता का अन्धकार फैल जाता है। यह दयनीयता वह है जो हमें अतीत से जोड़े हुए है। यह वह आँवनाल है हमारी, जो गिरी ही नहीं। 

जानते हैं जब किसी शिशु की आँव-नाल न गिरे या देर से गिरे तो उसे मेडिकल-भाषा में किसका इशारा माना जाता है? शिशु की प्रतिरोधक क्षमता की हालत बहुत-बहुत बुरी है। प्रतिरोध अँधेरे का, प्रतिरोध अज्ञान का - हो नहीं रहा, हो नहीं पा रहा।
– स्कन्द शुक्ल, फेसबुक से साभार