डार्विन के हक़ में एक क्रन्तिकारी लेख

ब्रह्माण्ड एक शून्य प्रक्रिया हैप्रत्येक प्राणी यहां समय बिताकर नष्ठ हो जाता है। और शब्दों का कोई अर्थ नही होता। आपके विचारों में हर चीज़ एक प्रतीक है। आप सिर्फ अपने जीवन में तसल्ली और सहारे के लिए प्रतीकों और विश्वास का इस्तेमाल कर सकते हैं।  वास्तविक विसंगति दृष्टि की है। ईश्वर/आत्मा/धर्म/ ये सब केवल शब्द हैं। वास्तविकता में ऐसा कुछ नही है दोस्तों। कल्पना करें आपको जन्म लेते ही अँधेरे कमरे में भोजन पानी के साथ बन्द कर दिया जाता और 40 साल बाद निकाला जाता तो आप क्या करते? आप केवल एक छोटे कमरे में बन्द रहते और बाहर आकर कुछ भी नही मानते। ईश्वर का नाम सुनकर विश्वास ही न करते। कतई ना करते। आपको 40 साल तक बन्द कमरे जुत्तों की पूजा होती हुई एक फ़िल्म दिखाई जाती, तो आज जुत्तों को भगवान मन लेते, 40 साल तक मोमबत्ती को ईश्वर बताया जाता तो आप उसे इष्ट मन लेते। यानि, की हर चीज़ बाहर से आती है। नास्तिकता भी बाहर से और आस्तिकता भी बाहर से।

हमारा शरीर केवल एक जीव है, यानि एक चलती फिरती मशीन। इसे बाहर से ही ज्ञान मिलता है।हम जो देखते (सुनते) हैं विचारधाराएं बन जाती हैं। अंदर तो मशीनी प्रक्रियाएं हैं और एक तन्त्रिका तन्त्र है जो पकड़ में आई सूचनाओं को ग्रहण करता है और सच मान बैठता है। इसलिए खुश रहें, आनन्दित रहें। धर्म/ ईश्वर के लिए किसी को दुःख न देवें, लड़ाइयां न करें।  यारो, आखिर चींटियाँ भी जीव ही हैं। वो तो नही जाती कुछ भी। आखिर ईश्वर उन नर नारियों के दिमाग़ की पैदाइश नहीं है जिन्होंने अनन्त दूरदर्शी प्रथम कारणों की परिकल्पना की, बल्कि उन दिलों की खोज है जो हितबद्ध ईश्वर के लगातार हस्तक्षेप के लिए लालायित थे।


डार्विन की थ्योरी ने मनुष्य और जानवरों के बीच के अंतर को ही खत्म कर दिया। इसलिए जब कीड़े मकोड़े बिना ईश्वर/धर्म/तर्कों/नियमों पर अपना जीवन खुशहाली से जी सकते हैं ..तो हम क्यों नही? इसलिए दोस्तों, फ़िज़ूल की बातो में समय व्यतीत न करें 

न तो कोई शक्ति है ब्रह्माण्ड में और न कोई सत्यता। हम निर्जीव पदार्थ से बने हैं और 100-50 साल बाद निर्जीव ही होना है। प्रत्येक जीव शरीर सूचना प्रक्रमित प्राणी है। इसलिए खुश रहे , ज्यादा से ज्यादा लोगों को खुश रखें। मेरे तर्कों पर अंगुली उठाने से पहले कृपया ‘द लाइफ एंड लैटर्स ऑफ चार्ल्स डार्विनपढ़ लेवें। या आइज़ैक डिज़्रेलि की किताब - "लेखकों के झगड़े पढ़ लेवें'

स्वामी जी बैरागी गरीब दार्शनिक