भगवान की जरुरत किसे है?

वास्तव में भगवान का जन्म ही दुर्बलता से हुआ है। यह उन लोगो के लिये है जो कमज़ोर और भीरू हैं। अगर आप स्वयं अच्छा और बुरा समझते हैं; सही और गलत में भेद कर सकते हैं, तो आपको भगवान की कोई ज़रूरत नहीं।
अपनी यह बात एक उदाहरण से समझाने की कोशिश करता हूँ। जब बच्चा छोटा होता है तो उसे सुलाने के लिये माँ कहती है कि बेटा सो जा वरना बाबा आ जायेगा, तो बच्चा बाबा के डर से सो जाता है। यहां स्वघोषित मां धर्म है बेटा आस्तिक और बाबा है ईश्वर जो वास्तव में है ही नहीं।
हालांकि माँ बेटे के भले के लिये उसे सुला रही है पर गलत तरीके से। अगर बेटा समझदार है, तो उसे बाबा से डराने की क्या ज़रूरत ? कुछ ऐसी ही नास्तिकता है।
नास्तिकता तर्क पर आधारित है, आस्तिकता की तरह झूठी श्रद्धा और विश्वास पर नहीं। आस्तिक स्वयं कहते है कि "भगवान आस्था का भूखा है"। वास्तव में भगवान आस्था का भूखा नहीं, बल्कि उसका अस्तित्व ही आस्था से है।
भगवान आस्था के बिना कुछ नहीं। तभी तो सारे चमत्कार और यहां तक की दुआयें भी विश्वास ना होने पर असर नहीं करती। आस्तिक जिसे भगवान की शक्ति कहते हैं, वो वास्तव में विश्वास की शक्ति होती है, परंतु नास्तिक किसी भगवान नाम की स्वनिर्मित संस्था में विश्वास करने की बजाय खुद में विश्वास करना पसंद करते हैं।
आस्तिक कायर होता है जिसे अपने साथ भगवान का साथ चाहिए होता है। मुश्किल पलों का सामना करने में उसे डर लगता है। ऐसी स्थिति मे भगवान उसे एक मनोवैज्ञानिक आधार देता है जिससे प्रार्थना करके उसे थोडी राहत मिलती है। नास्तिक भगवान को नहीं मानता इसीलिये खुद ही लडता है चाहे वक़्त कैसा भी हो।


अब एक बार फिर से सोचिये। जो नहीं मानता उसके लिये भगवान कुछ नहीं है और जो मानता है उसके लिये भगवान सब कुछ है। इसका मतलब हुआ कि भगवान इतना कमज़ोर है कि वो सिर्फ मानने से ही ज़िन्दा है, तब तो यह महज़ भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं।

पुष्पेन्द्र नास्तिक