धार्मिक टीकाकरण के खतरे

एक मासूम-सा बच्चा जन्म लेता है दुनिया के नियम, पूर्वाग्रह, नफ़रत, भागदौड़ से मुक्त जन्म के साथ ही माता-पिता, परिवार वाले, पड़ोसी, समाज वाले और सत्ताखोर लोग बचपन से उस पर अपने स्वार्थ को लादना शुरू कर देते हैं इन कई स्वार्थों में सबसे खतरनाक होता है धर्म 
बच्चे का पोलियो, खसरा, कालाजार आदि का टीकाकरण बाद में होता है, धार्मिक टीकाकरण पहले होता है धीरे-धीरे उसमें अपने धर्म को बेहतर मानना सीखाया जाता है और दुसरे धर्मों की कमतर और हीन 
उन्हें यह अहसास ही नहीं होता कि बच्चों के मन में दूसरे धर्म के प्रति स्वतः ही घृणा या भय पैदा हो रही होती है जिससे समाज में वह संकुचित दायरे में रहकर अपना जीवन व्यतीत करने लगता है। इससे न केवल मानव सीमित और कुंठित बनता है, बल्कि प्रकृति के उपहारों से भी वंचित हो जाता है धर्म के नशे में डूबा इनसान खुद से नहीं, बल्कि किसी उपरवाले से उम्मीद करने लगता है वह मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरिजाघर के चक्कर में ऐसा पड़ता है कि जिंदगी भर निकल नहीं पाता

यह है धर्म का टीका लगाना 
साथ ही सत्ता के लोभ में वह धर्म के ठेकेदारों और राजनेताओं के हाथों की कठपुतली बन जाता है धर्म के लिए जान देना और जान लेना मानो खेल समझने लगता है यह सब कुछ वह धर्म और ईश्वर की नाम पर करता है उसके लिए इनसान महत्वपूर्ण नहीं होते, उसका आसमानों में रहने वाला काल्पनिक ईश्वर महत्वपूर्ण हो जाता है
झूठ, अन्धविश्वास, आडम्बर, मूढ़ता, परलोकवाद, किस्मत आदि की कितने ही भूलभुलैया में घूमता घूमता जिन्दगी ख़राब करता है और एक दिन इस अनमोल जीवन को कष्ट झेलता हुआ मिट्टी के हवाले हो जाता है सोचिये कितना खतरनाक है यह धर्म
धर्म को इस लिहाज से बच्चों के लिए बाल-शोषण घोषित कर देना चाहिए और मानवता को एक गंभीर बीमारी से बचाना चाहिए