दैहिक सुख से क्यों समझौता करे एक स्त्री?

वो लड़कियाँ/स्त्रियाँ चरित्रहीन होती हैं जो अपने दैहिक सुख के बारे में सोचती हैं, बोलती हैं। ये दैहिक सम्बन्धों पर बोलने, सोचने और कब किसके साथ क़ायम करना है, इस पर एकमेव राज्य पुरुषों का ही तो है।
अव्वल तो हमारा समाज ऐसी लड़कियों को मैन्युफ़ैक्चर ही नहीं करता। वो वोकल हो, अपनी शारीरिक ज़रूरतों को ले कर और जिनकी संख्या गिनी-चुनी है, जिन्हें लगता है कि दैहिक ज़रूरत भी उतना ही ज़रूरी है जितना आत्मिक सम्बंध, तो उन्हें 'निम्फो' या 'वैसी लड़की' वाले किसी श्रेणी में हम तुरंत डाल देते हैं।
पुरुष को हक़ है अपने मन के मुताबिक़ सम्बंध बनाने की, फिर उस सम्बंध में रह कर निभाने या ख़ुद को यायावर बोल कहीं और चले जाने की। यह पुरुषों की प्रकृति का हिस्सा है मगर जब स्त्री यही करे तो नैतिकता उसके सामने आ खड़ी होती है।
क्यूँ ये ज़रूरी है कि शारीरिक सम्बंध तभी बने जब पुरुष साथी को लगे? ये सम्बंध तब क्यूँ नहीं स्थापित हो जब दूसरे साथी को इसकी दरकार महसूस हो? क्यूँ स्ट्रेस सिर्फ़ पुरुषों को ही होता है? और उस स्ट्रेस को रिलीज़ करने के लिए उनके तरफ़ से ही सम्बंध बने। क्या लड़कियों को स्ट्रेस नहीं होता?

तस्वीर ‘साइकोपैथी अवेयरनेस’ से साभार 

मतलब कुछ मर्द का हर चीज़ चाहे कितना ही छोटा क्यूँ न हो
'ईगो' बहुत बड़ा होता है। दैहिक सम्बन्धों पर अगर साथी ने टोक दिया या आग्रह कर दिया तो तुरंत 'हर्ट' हो जाना और मर्दानगी पर ले कर बैठ जाना अपना हक़ मानते हैं। पहले तो मज़ाक़-मज़ाक़ में उसकी ज़रूरतों को दबाएँगे और इससे भी बात नहीं बनी तो 'निम्फो' का सर्टिफ़िकेट दे पल्ला झाड़ लेंगे।
ज़रूरत है वर्जनाओं को तोड़ अपनी ज़रूरतों के लिए आवाज़ मुखर करने की। वो सती और सीता का ज़माना गया। वैसे भी भारत एक ऐसा देश है जहाँ बाप मर्द नहीं बन सकते, तब भी बाँझ औरतें कही जाती हैं।


– ‘विज्ञानवादी महिलायें’ फ़ेसबुक ग्रुप से साभार