हम अपनी सोच और कर्म से कितने स्वतंत्र हैं?

एक सवाल है जो काफी समय से परेशान कर रहा है। सवाल सीधा सा है कि हम जो सोंचते हैं वही करते हैं ऐसा हमें लगता है लेकिन क्या हम कुछ भी सोंच पाने के लिए वाकई स्वतंत्र होते हैंफ्री विल यानि कि स्वतंत्रता से निर्णय ले सकने की क्षमता क्या सच में हममें पायी जाती है या फिर ये एक भ्रम मात्र है?

तस्वीर स्लेट.कॉम से साभार 

हम जब भी कहते हैं कि हमारे पास फ्री विल है तो हम दो बातों को मान कर चलते हैं
, पहला कि हमने पहले जो किया था, उससे अलग कर सकते थे और दूसरा, कि अपनी सोंच के लिए ज़िम्मेदार हम ही हैं।
आगे हम देखेंगे कि ये दोनों ही बातें गलत हैं। विकल्प का पैदा होना एक एक रहस्यमय प्रक्रिया है। वैसे फ़्री विल का मतलब भी अलग अलग दृष्टिकोण से देखने पर अलग अलग निकाला जा सकता है इसलिए किसी तरह का कंफ्यूजन न हो, उसके लिए हम इस सवाल और उसके जवाब की पड़ताल तीन अलग अलग स्तरों पर करेंगे।
पहला सोशल लेवल, दूसरा बायोलॉजिकल लेवल और तीसरा फिज़िकल लेवल।
मैं क्या सोंचता हूँ, मेरा व्यक्तित्व कैसा है, मेरी बुद्धिमता कितनी है, मेरा रंगरूप कैसा है, या आज मैं जो भी हूँ जैसा भी हूँ उसके वैसा ही होने का कारण मेरे जींस, मेरी परवरिश, मेरा परिवेश और मेरे बचपन से आजतक हुए हुए अनुभव हैं।
मैंने अपने माता पिता को नहीं चुना, अपने परिवार और परिवेश को नहीं चुना, अपने जन्म के समय और स्थान को नहीं चुना, अपने लिंग और अपने जींस को भी नहीं चुना।
यहाँ तक कि ज्यादातर सामाजिक अनुभव भी मेरी मर्जी से नहीं हुए। पर मेरा दिमाग जो भी निर्णय लेता है उसमें इन्हीं सब का बड़ा रोल होता है। ऐसे में स्वतंत्रता कहाँ थी? हाँ मुझे लगता है कि मैं जो करता हूँ अपनी मर्जी से करता हूँ लेकिन उसे करने की वो इच्छा कहाँ से आती है? क्या मेरे निर्णय असल में स्वतंत्र होते हैं

मेरे हर निर्णय के पीछे एक कारण है और उस कारण का भी कारण है। मैं आगे जो भी करूंगा वो पिछले कारण के कारण करूंगा। जिसका मतलब हुआ कि अगर कोई शेरलक होम्स मेरे बारे में सबकुछ जानता हो तो वो मैक्सिमम एक्यूरेसी से ये प्रिडिक्ट कर सकता है कि मैं आगे क्या सोंचूंगा और क्या करूँगा। और अगर कोई शेरलक होम्स मेरे सोंचने से पहले ही जान सकता है कि मैं क्या करूँगा तो ऐसे में मुझे केवल भ्रम था कि मैं फ्रीली सोंच सकता हूँ। वो ऑलरेडी प्रिडिक्टेबल था।