क्यों हैं कम है भारत में नास्तिकों की संख्या?

कई लोग यह प्रश्न करते हैं कि शहरों में बहुत लोग पढ़े-लिखे हैं और कई लोग अच्छा ख़ासा ज्ञान भी रखते हैं, लेकिन फिर भी वे सब भगवान, ईश्वर, अल्लाह इत्यादि में विश्वास करते हैं। ..तो क्या हमें यह समझना चाहिए कि वे सब मूर्ख हैं या उनमें तर्कशक्ति का अभाव है? वैज्ञानिक, डॉक्टर्स, प्रोफेसर्स और ऐसे कई क्षेत्रों में ऐसे ही कई प्रज्ञावान लोग हैं, जो इतना ज्ञान होने के बावजूद भगवान में विश्वास करते हैं। ऐसा क्यों?
दोस्तों, आप ज़रा अपने जीवन पर एक नज़र डालें या फिर कोई बच्चा आपके जीवन में ज़रूर होगा, उसी के जीवन पर एक नज़र डालिए। आप थोड़ा गहराई से विचार करेंगे, तो आपको दिखेगा कि आप लग़ातार प्रतिदिन उस बच्चे के जन्म लेते ही उसके दिमाग़ में भगवान के बारे में सारी कहानियां डालना शुरू कर देते हैं। 

आप रोज़ उसे डराते हैं कि रोज़ भगवान को याद करो नहीं तो वो तुम्हें लोभी समझेगा। रोज़ अगरबत्ती जलाओ। गीता, रामायण का पाठ करो, तो तुम्हारे साथ अच्छा होगा। व्रत रखो यदि कोई इच्छा है तो, भगवान इच्छा पूरी करेगा। गलत काम करोगे, तो नर्क में जाओगे, अच्छा करोगे तो स्वर्ग मिलेगा, इत्यादि। 

तस्वीर ‘फ्लिकर’ से साभार 
यहाँ पर आपने अपनी संस्कृति से कुछ सीखा जो मिथ्या है क्यूंकि इसका कोई प्रमाण तो है नहीं, और अब आप उस मिथ्या को अपने बच्चों को उसी तरीके से सिखाते हैं जैसे आपने खुद सीखा था। वह भी सिर्फ किसी की कही-सुनी बात पर विश्वास कर के। इसे कहते हैं कल्चरल कंडीशनिंग या सांस्कृतिक अनुकूलन।


अब आप जिस व्यक्ति के दिमाग़ में उसके पैदा होते ही किसी चीज़ के बारे में रोज़ कुछ न कुछ डालना शुरू कर दें, उस चीज़ को त्याग देना किसी के लिए आसान नहीं होता। समाजसंस्कृतिधर्मजाति-व्यवस्था इत्यादि ने उसके दिमाग़ में इतना कचरा भर दिया है कि वह उसके अनुसार चलने कि कोशिश करता है। अब समझ लीजिये कोई मेडिकल का विद्यार्थी है। लेकिन वह मेडिकल कॉलेज में जा कर अपनी पढ़ाई में इतना व्यस्त व परेशान रहता है कि उसे इन सब बातों पर सोचने-विचारने का समय नहीं है।

ईश्वर क्या है, धर्म क्या है, ईश्वर को क्यों अगरबती दिखाते हैं, ईश्वर सचमुच होता है या नहीं, ईश्वर एक है या अनेक है, आकाश में रहता है या जमीन पर, इंसानों जैसा दिखता है या निराकार है आदि तरह तरह के सवाल बहुसंख्य के मन में आता ही नहीं।

अगर आता है तो संस्कृति और भीड़ की कंडीशनिंग इतना ज्यादा है कि उसे ही गलत हो जाने का डर होता है। ईश्वर के अस्तित्व के नहीं होने का, उसके दिमाग में ख्याल भी नहीं आता, क्योंकि उसे अपने आसपास और सारे समाज द्वारा उसे मानते हुए देखा जाता है। 

कुछ अल्पसंख्यक जरुर होते हैं जो भीतर ही भीतर सोचते हैं, पर सवाल उठाने की हिम्मत नहीं करते। दूसरी बात यह भी है कि वो नास्तिकता जैसी विचारधारा के बारे में सोच सकें तथा अपनी सोच को अभिव्यक्त कर सकें, इसके लिए पहले उसे इसके बारे में बात करने वाले लोगों से मिलना होगा या उसे कम से कम ऐसे लेख पढ़ने होंगे, चर्चा करना होगा जो इस विचारधारा को उसके सामने प्रस्तुत कर सकें। जब उस विद्यार्थी के दिमाग़ में ऐसा कुछ जायेगा ही नहीं, तो वो इसके बारे में गंभीरता से क्यों सोचेगा

अब ये मेडिकल कॉलेज, वहां के शिक्षक और उस शहर पर भी निर्भर करता है कि विद्यार्थी वहां नास्तिकता के बारे में कुछ जान पायेगा या नहीं। अगर मेडिकल कॉलेज किसी पिछड़े राज्य या छोटे कस्बे में है तो इस बात कि बहुत कम संभावना है कि उसे कोई ऐसा मिलेगा जो नास्तिक विचारधारा रखता हो। इसके फलस्वरूप वो इसे जानने कि कोशिश ही नहीं करता।

हम यह नहीं कह रहे कि यदि वो इसे जानना समझना शुरू कर दे तो वो तुरंत नास्तिक बन जाएगा। लेकिन ये पहला कदम ज़रूर है। और आज से 20-25 वर्ष पहले तो स्थिति और ख़राब थी जब लोग इतने पढ़े लिखे नहीं थे। और इसीलिए बहुत से भारतीय वैज्ञानिक भी भगवान में विश्वास करते थे, ख़ासकर भारत जैसे देश में। लोग पूछ सकते हैं कि विज्ञान तो पढ़ा ही था इन्होनें, फिर भी क्यों नास्तिक न बने? तो आप ये याद कीजिये कि विज्ञान कि कितनी किताबें आपने पढ़ी हैं अभी तक जिनमें नास्तिकता का उल्लेख़ हो। शायद एक भी नहीं। जब तक आप किसी संकल्पना को अपने दिमाग़ में नहीं लाएंगे तब तक उस बारे में गहराई से सोचेंगे कैसे

अब आजकल इंटरनेट और मोबाइल का ज़माना है। सोच विचार का आदान-प्रदान पहले से बहुत आसान हो गया है। शिक्षा का स्तर पहले से काफी बेहतर हो गया है। और इन कारणों से आज आप देखिये कि कितने देश नास्तिकता कि ओर अग्रसर होते जा रहे हैं। और आप ये भी पाएंगे कि जिन देशों ने अपने आप को भगवान, धर्म, जाति इत्यादि से बाँध रखा है वो सभी नास्तिक देशों से बहुत पिछड़े हैं। भारत में भी नास्तिकों कि संख्या बढ़ रही है, हालाँकि रफ़्तार बहुत ही धीमी है जिसका एक कारण सरकार का शिक्षा पर ज़ोर न दे पाना भी है। अब आप सोचिये, आप भारत को आगे बढ़ाना चाहते हैं या इसी मानसिकता के साथ पिछड़े रहना चाहते हैं।