वैज्ञानिक शिक्षा के बावजूद अन्धविश्वास

जो लोग शिक्षा से वंचित हैं वे यदि अंधविश्वासों में संलग्न हों तो कोई आश्चर्य नहीं। लेकिन जब पढ़े लिखे, तथाकथित उच्च शिक्षित जब अंधविश्वासों में संलग्न होते हैं तो यह बहुत निराशाजनक और असहनीय है। खासतौर पर डॉक्टर और वैज्ञानिक।
असल में विज्ञान की शिक्षा लेने वाले अधिकांश लोगों के लिए विज्ञान मात्र उनकी रोजी का जरिया है जीवन दर्शन नहीं। विज्ञानवेत्ता होने के नाते अपने जीवन के हर पहलू में जिस वैज्ञानिक दृष्टिकोण की उम्मीद उनसे रखी जाती है वह उनके दैनिक जीवन में कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। वैज्ञानिक दृष्टिकोण उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा है ही नहीं उसका इस्तेमाल वे बस ऐच्छिक रूप से अपने पेशे के लिए करते हैं। जबकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि वैज्ञानिक विधि कितनी कारगर है, फिर भी वे इसका प्रयोग अपने दैनिक जीवन में नहीं करते।

तस्वीर साभार घानाटेक.नेट से साभार 

एक डॉक्टर जब तक अपना पेशा करता है बस तभी तक वह वैज्ञानिक विधि और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का इस्तेमाल करता है। अपना कोट उतारते ही वह साधारण मनुष्य बन जाता है। जबकि वह भली भांति जानता है कि मेडिकल साइंस की किसी किताब में आत्मा जैसी किसी चीज का जिक्र नहीं है और न ही आज तक किसी के पास इसके अस्तित्व का कोई भी प्रमाण मौजूद है, लेकिन फिर भी वह अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पांचवी फेल पंडित, दो कौड़ी के आदमी के आगे गधों की तरह सर झुकाए श्राद्धकर्म करता है।

इसी तरह वैज्ञानिक भी अपने दैनिक जीवन में तमाम अंधविश्वासों और पाखण्डों में संलग्न देखे जा सकते हैं।
ये लोग असल में उस कैदी जैसे हैं जिसके पास अपनी कालकोठरी के ताले की चाबी मौजूद है, लेकिन फिर भी वह कभी कैद से आजाद होने का साहस नहीं करता। वह बस जरूरत भर के लिए कोठरी से बाहर जाता है और जल्दी से काम खत्म कर वापस लौट खुद को कोठरी में कैद कर लेता है।
उसकी ब्रेनवॉशिंग इस तरह की है कि उसे लगता है कि जीवन जीने का बस यही एकमात्र विकल्प है। इस कोठरी से आजाद भी कोई जीवन हो सकता है इसकी वह कल्पना भी नहीं कर सकता।

– अर्पित द्विवेदी