अंधश्रद्धा, प्रमाण और बेफिजूल की कसरत

धर्म प्रवर्तकों और प्रचारकों को प्रमाण के भूत ने बहुत परेशान किया है। क्योंकि हर दौर में कुछ लोग ऐसे जरूर रहे हैं जो उनके खोखले दावों पर सवाल खड़े करते रहते थे और उनसे उनके दावों के पक्ष में प्रमाण मांगते थे। पश्चिम में तो चूँकि लोग तर्क में कम और तलवार में ज्यादा विश्वास करते थे इसलिए वहां धार्मिक दावों पर ज्यादा तर्क वितर्क हो नहीं पाया, लेकिन भारत में चूँकि स्थिति थोड़ी बेहतर थी, इसलिए यहाँ धार्मिक दावों पर तर्क वितर्क की परम्परा रही है। 
भारत में धार्मिक दावों का प्रमाण मांगने वालों से जद्दोजहद के फलस्वरूप तर्क-शास्त्रों की रचना हुयी। जहाँ तर्क-वितर्क द्वारा अपनी मान्यताओं को सत्य सिद्ध करने का प्रयास किया गया। लेकिन धार्मिक दावों के पक्ष में दिए जाने वाले तर्क भले ही कितने ही तार्किक प्रतीत होते हों एक सवाल फिर भी अनुत्तरित रहा, कि “आपकी जानकारी का स्रोत क्या है? अर्थात जो दावा आप कर रहे, हैं उस निष्कर्ष पर आप किस प्रकार पहुंचे


उदाहरण के तौर पर कर्म-सिद्धांत, आत्मा, पुनर्जन्म और चेतना सम्बन्धी दावे सुनने में भले कितने ही तार्किक प्रतीत हों, लेकिन यदि आप पूछें कि इस दर्शन का प्रतिपादन कर्ता इन निष्कर्षों पर कैसे पहुंचा? उसने कैसे पता लगाया कि यह दुनिया कर्म-सिद्धांत जैसे सिद्धांत के अधीन चल रही है? जो व्यक्ति जन्म से ही गरीब और लाचार है, वह उसके पूर्वजन्म के कर्मों का फल है, यह किस तरह ज्ञात हुआ? शरीर में आत्मा होती है, जो मृत्यु के बाद नए शरीर में प्रवेश कर जाती है, यह कैसे ज्ञात हुआ? इस समस्त जगत की उत्पत्ति और इसके सभी क्रियाकलाप एक अद्रश्य स्वतंत्र चेतन सत्ता द्वारा संचालित हो रहे हैं, इस निष्कर्ष पर किस तरह पहुंचा गया? तो आपको इसका कोई भी संतोषजनक तर्क-संगत उत्तर नहीं मिलता था। प्रश्नकर्ता को बस इतना कहा जाता था कि आदि ऋषियों ने गहन साधनाओं से प्राप्त अनुभवों से इसे जाना। वैसे ये तरीका कुछ कुछ पश्चिमी धर्मों जैसा ही है, बस फर्क इतना है कि वे ऋषियों के स्थान पर पैगम्बरों का नाम लेते हैं जिनके पास यह जानकारी ईश्वर ने किसी माध्यम से पहुंचाई।

लेकिन झूठ के पैर तो होते नहीं हैं, जो वह बिना सहारे के खड़ा रह सके। उसे खड़ा रखने के लिए तो निरंतर संघर्ष करना पड़ता है। लोगों ने फिर सवाल उठाने शुरू कर दिए कि ऋषियों में कौन से सुर्खाब के पर लगे थे जो उन्होंने जान लिया? और चलो उन्होंने किसी तरह जान भी लिया तो क्या हमको उनकी बातों पर आँख मूंदकर भरोसा करना चाहिए? ये कैसे तय होगा कि वे सच ही बोल रहे हैं?
तब फिर एक नया झूठ गढ़ना पड़ा कि आप भी कुछ कठिन साधनाओं से गुजरकर, इस सत्य का साक्षात्कार कर सकते हैं। साधनाओं के नाम पर ऐसी ऐसी व्यर्थ की अंतहीन कसरतें ईजाद कर ली गयीं, जिनका न कोई ओर न छोर। और तो और प्रमाण मिलने की कोई समय सीमा भी निर्धारित नहीं है। हो सकता है, कई जन्म प्रमाण खोजने में ही व्यतीत हो जायें। और फिर मरने के बाद कौन आकर बताएगा कि प्रमाण मिल गया।
अब तो बड़ा आसान हो गया, जो भी प्रमाण मांगे उसे प्रमाण देने के स्थान पर बेफिजूल की कसरत में उलझा दो। कह दो, प्रमाण दिया नहीं जा सकता, आपको स्वयं अनुभव करना होगा। मतलब मेलोडी खाओ खुद जान जाओ। अब बेचारा लगा पड़ा है बेकार की कसरत में। इस उम्मीद में कि एक दिन प्रमाण मिल जाएगा। लेकिन प्रमाण हो तो मिले। 
जो शिकायत करे कि प्रमाण नहीं मिल रहा, उसे कह दो कि तुम कसरत ही ठीक से नहीं कर रहे। तुम इस योग्य ही नहीं हो। और फिर व्यक्तिगत अनुभवों का मूल्य ही क्या है, यदि उन्हें किसी भी तरह सिद्ध न किया जा सके तो। मानसिक भ्रम के शिकार मनोरोगियों को भी विचित्र द्रश्य दिखाई देते हैं, विचित्र अनुभव होते हैं। उनके लिए, वे इतने वास्तविक जैसे होते हैं कि वे उनमें और वास्तविकता में फर्क नहीं कर पाते। ऐसे में जिन अनुभवों को कोई व्यक्ति अध्यात्मिक अनुभव समझ रहा है, वे वास्तविक हैं, कोई मानसिक भ्रम नहीं इसका निर्णय कैसे होगा?
वैसे इस गजब की युक्ति से किसी का भला हुआ हो या नहीं लेकिन अध्यात्मिक गुरुओं ने इसके नाम पर बड़ी चांदी काटी है और आज भी काट रहे हैं। अतीत में और वर्तमान में भी तमाम ऐसे गुरु मौजूद हैं, जो न केवल स्वयं के आध्यात्मिक रूप से जाग्रत होने का दावा करते हैं, बल्कि अपने अनुयायिओं को भी आध्यात्मिक अनुभव करा देने का वादा करते हैं। 
वे ऐसा दावा आराम से कर सकते हैं क्योंकि जब प्रमाण देना ही न हो, तो दावा करने में क्या जाता है? जो मन में आये दावा करो। जो भी प्रमाण मांगेगा, उसको सिर घुटाकर चटाई पकड़ा देंगे। लग जा बेटा लाइन में। और तो और भारत में ऐसे मूर्खों की भी कोई कमी नहीं जो बिना जाने बिना किसी अनुभव के ही, शास्त्रों को प्रमाण मानकर योग-साधनाओं को प्रमाण प्राप्ति का साधन बताते हैं।

वैसे कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनको अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इन व्यर्थ की कसरतों में नष्ट करने के बाद अक्ल आ गई थी। लेकिन तब वे जीवन के उस मोड़ पर पहुँच चुके थे, जहां से यू-टर्न लेना संभव नहीं था। जिस चीज में आप अपने जीवन के एक कीमती महत्वपूर्ण हिस्से का निवेश कर चुके हों, जिसके नाम से समाज में आपकी एक पहचान बन गयी हो, उसकी सच्चाई जानकर भी उसे इस तरह छोड़ देना आसान नहीं होता। एक ऐसे ही व्यक्ति को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ जो इन्हीं परिस्थितियों में फंसा हुआ है।    

ये परिस्थिति कैसी होती है, एक कहानी के माध्यम से आपको समझाता हूँ।
एक व्यक्ति की परदेश में चोरी के अपराध के कारण राजा ने नाक कटवा दी। कई वर्ष बाद जब वह अपने गांव की ओर लौट रहा था, तो बड़ा चिंतित था कि गांववासियों को क्या कहूंगा? ये नाक क्यों कटी? अब घर तो जाना ही था, तो रास्ते भर चिंतन-मनन करता हुआ घर पहुंचा। गांव में घुसते ही जो व्यक्ति मिलता वह यही सवाल करता कि तुम्हारी नाक कैसे कट गई? वह सबको कहता जाता कि सुबह चौपाल पर मिलना वहां बताऊंगा।
सुबह चौपाल जुटी, पूरा गांव जुटा। सरपंच जी ने पूछा, "बताओ भाई नाक क्यों कटी?
वह व्यक्ति बोला, "मुझे एक महान तपस्वी मिल गए थे जिनकी कृपा फलस्वरूप मुझे ईश्वर का साक्षात्कार हो गया है।
"वो तो ठीक है पर इसका नाक कटने से क्या संबंध?
अरे! नाक ही तो बाधा है। यदि नाक को हटा दिया जाए तो कोई भी व्यक्ति ईश्वर के साक्षात्कार को सहज उपलब्ध हो सकता है।
"क्या बकवास करते हो? सरपंच ने कहा।
"मैं बकवास नहीं कर रहा। आप नाक कटवा कर देखिए, मैं वचन देता हूँ कि मैं आपको ईश्वर का साक्षात्कार अवश्य करवा दूंगा।
और फिर कुछ देर बहस के बाद आखिर सरपंच नाक कटवाने को राजी हो गया। सोचा नाक का क्या है, आधा जीवन बिना नाक के रह लेंगे। ईश्वर का साक्षात्कार हुआ, तो जीवन सफल हो जाएगा।
खैर सरपंच ने अपनी नाक की कुर्बानी दी। जब नाक कट गई, तो उस व्यक्ति ने सरपंच के कान में कहा, "सरपंच जी नाक तो गई। अब आपके पास दो विकल्प हैं, या तो सारा जीवन नकटे मूर्ख की तरह गुजारो, या फिर कह दो मुझे साक्षात्कार हो गया और मेरी तरह सम्मानित जीवन जियो।
और सरपंच ने वही कहा जिसकी आशा थी। मुझे साक्षात्कार हो गया।