बेड़ियों को खोल दीजिए, आजाद कर दीजिए

पता नहीं पशु-पक्षियां दिवा स्वपन देखते हैं या नहीं, लेकिन मनुष्य खूब सपने देखता है। कल्पना, परिकल्पना और अनुमान लगाने में आदमी का कोई सानी नहीं है। कहते हैं जहां जाए ना रवि, वहां जाए कवि। 
मनुष्य प्राचीन काल से ही कल्पना परिकल्पना और अनुमान लगाने में व्यस्त है। न सिर्फ अनुमान लगाने में व्यस्त है, बल्कि अनुमानों को लिखकर लंबी-चौड़ी पोथियां रचने में भी आदमी का कोई सानी नहीं है। 

सांप के सिर पर पृथ्वी का टिकना या 7 दिनों में चांद तारे और पृथ्वी के सृजन की कथा या स्वर्ग में सुंदर-सुंदर फूल और नारियों, परियों का होना, या नरक में बड़े भयानक सूरत वाले बड़े-बड़े मूँह और सिंह वाले प्राणियों का होना, मनुष्य के कल्पनाशील होने का सबसे हसीन और दिलचस्प प्रमाण है।

मनुष्य ने अनदेखे, अनजाने प्रकृति की शक्तियों का मानवीकरण करके तमाम ईश्वर, भगवान और ऊपर वालों को आदमी की तरह परिकल्पनाओं से विनिर्मित कर दिया। उन्होंने ईश्वर को कैद करने के लिए तमाम बड़े-बड़े प्रार्थनालय और पूजालय भी बना लिया।  कईयों ने तो ईश्वर कैसे उठता-बैठता है और सांस लेता है तथा उसके बगल में कौन बैठता है,  यह भी अनुमान लगा लिए है। 

तस्वीर ‘आइडेंटिटी मैगज़ीन’ से साभार

लेकिन देखिए कई लोग कहते हैं सपने देखने में क्या पैसा भी खर्च होता है? अरे भाई सपने देखने के बाद कितना खर्च करना पड़ता है, सपना वाले घरों को निर्माण करने में। जेब को भारी पड़ता है भाई। गज़ब तो तब हो गया जब वे इसे यूनिवर्स का अंतिम-सत्य और तथ्य कह कर, दूसरों के दिमाग में डालने लगे।  लोग सदियों तक पढ़ते रहे कि चांद, सूरज और तारे पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाते रहते हैं। कल्पना करने वाले भाइयों ने, पृथ्वी के खास -खास जगहों को यूनिवर्स का केंद्र-बिंदु भी बता दिया। दिमाग को गिरवी रखने वाले लोग अभी भी इसे ही अंतिम सत्य समझते हैं। 
सचमुच आदमी गजब का कल्पनाशील है और वह अपनी कल्पना में पूरे ब्रह्मांड को अपने कल्पना करने की मशीन का जूती समझता है। 

मनुष्य का दिमाग निरंतर चलने वाला मशीन है और इस मशीन से हजारों तरह के उत्पादों का उत्पादन निरंतर होते रहता है। पूर्ण महिमावान है मनुष्य का दिमाग। बस यही एक अंतर है कि हर आदमी अपने आप में दूसरे से जुदा है, और जाहिर है कि हर दिमाग कल्पना में भी दूसरे से जुदा होगा। यह जुदापन ही सभ्यता के विकास के लिए अलग-अलग दृष्ठिकोण से सभी चीजों को देखने के लिए प्रेरित करता है। यही वास्तविक स्वतंत्रता है।
जब आदमी कल्पना में पिछड़ने लगता है या कल्पना करने में कोई बंदिश लगाया जाता है तो वहीं से परतंत्रता की बेड़ियाँ मजबूत होने लगती है।

बेड़ियों को खोल दीजिए, आजाद कर दीजिए, विश्व का हर मन ऊँजी उड़ान भरने लगेगा और कल्पना के अंतहीन सीमा तक उड़ता रहेगा। हर एक के कल्पना को सुनिए, उससे कुछ सीखने की कोशिश कीजिए और उससे भी अधिक ऊँची कल्पना की उड़ान भरिए। बस अपनी कल्पना को अंतिम सच्चाई घोषित मत कीजिए। देखिए मेधा का उड़ान क्या-क्या न जादू फैलाता है।
नेह इन्द्वार