आपने कभी सोचा है कि भारत में ऐसा क्यों है?

भारत में महिला को लेकर नजरिये और शोषण की बात हो अथवा धर्म को लेकर डबल स्टैण्डर्ड की; समाज में जन्माधारित भेदभाव की बात हो अथवा साजीसन एक समुदाय के साथ उत्पीड़न की; जाति या वर्ण की बात हो अथवा धार्मिक विद्वेष की; लोकतंत्र और मानवाधिकार की बात हो अथवा पर्यावरण के गलत उपयोग की, हर जगह कुरीति और कुनीति का बोलबाला है। आज से नहीं पुराने ज़माने से ब तकनीक के इस युग में भी। इन्हीं विषयों पर पढ़े संजय श्रमण का यह जोरदार और दिमाग खोलने वाला लेख।


जर्मनी में एक कॉन्फ्रेंस के दौरान डिनर के बाद एक जर्मन पति अपनी गर्भवती पत्नी से बात कर रहे थे, अपनी अजन्मी बिटिया के बारे में वे योजना बना रहे थे, क्या नाम रखेंगे कैसे उसका अपना कमरा सजायेंगे कैसे उसके जन्म पर पार्टी करेंगे इत्यादि। साथ मे उनकी एक अन्य बिटिया भी थी जो अपनी आने वाली बहन के लिए योजना बना रही थी और अपनी माँ से बार बार कुछ पूछ रही थी।
इस दम्पत्ति को गर्भ में पल रही बिटिया की जानकारी हो चुकी थी। उनके देश का कानून भारत की तरह इस जांच पर पाबंदी नहीं लगाता, भारत में अगर अजन्मी बच्ची का लिंग पता चल जाए तो उसके लिए कैसी प्लानिंग होगी आप कल्पना कर सकते हैं। पूरी संभावना है कि बच्ची की गर्भ में ही हत्या कर दी जाए। इसीलिये भारत में लिंग जांच विरोधी कानून बनाना पड़ा है। आपने कभी सोचा है ऐसा क्यों है?
व्हाट्सएप और फेसबुक के जरिये जर्मन बच्चे पढ़ाई और स्कूल कालेज के असाइंमेंट हल करने और प्रोजेक्ट इत्यादि बनाने के लिए नेटवर्किंग करते हैं। भारत के बच्चे इन साधनों से जातीय, धार्मिक दंगों का पाठ पढ़ते हैं और राजनीतिक, ऐतिहासिक, सामाजिक प्रोपेगेंडा का शिकार बनाये जाते हैं। आपने कभी सोचा है ऐसा क्यों है?

यूरोपीय समाजों में ट्रैफिक, सार्वजनिक स्थलों (पार्क, सडकों, स्कूलों, कालेजों) आदि में CCTV कैमरों से सुरक्षा और अनुशासन को बेहतर बनाने का काम लिया जाता है। भारत में आजकल पूजन पंडालों में देवी देवताओं की लाइव पूजा को बड़े स्क्रीन पर दिखाया जाता है। साइबर पूजा चल निकली है। मोबाइल एप के जरिये कर्मकांड और पूजा पाठ किया जा रहा है। आपने कभी सोचा है ऐसा क्यों है?
विज्ञान और तकनीक से औद्योगीकरण और मशीनीकरण करने वाले यूरोपीय समाज ने अपने पर्यावरण को बेहतर बनाने का तरीका भी खोज लिया है। लेकिन भारत पाकिस्तान बांग्लादेश जैसे मुल्क औद्योगीकरण से उत्पादन जरुर कर रहे हैं लेकिन अगली पीढ़ियों के लिए जहरीला वातावरण भी तैयार कर रहे हैं। आपने कभी सोचा है ऐसा क्यों है?
ऐसे कई और उदाहरण हैं। इन सबका एक ही कारण है। दक्षिण एशियाई समाजों ने लोकतंत्र, मानव अधिकार, सभ्यता और वैज्ञानिक सोच की लड़ाई अपनी जमीन पर नहीं लड़ी। निश्चित ही कॉलोनियल लूट ने भी उन्हें कमजोर बनाया है। कुल मिलाकर इन समाजों में सामाजिक चेतना, सभ्यता और लोकतंत्र की समझ ही विकसित नहीं हो सकी है।

विज्ञान और तकनीक को कहीं से उधार ले आने से ये तय नहीं होता कि आपका समाज उसे इस्तेमाल करने की बुद्धि भी हासिल कर चुका है। इन ताकतवर साधनों को इस्तेमाल करने की बुद्धि कहीं से उधार नहीं ली जा सकती। बन्दर अपने हाथ में उस्तरा जरुर ले सकता है लेकिन वो कब खुद की और दूसरों की नाक काटेगा या उससे खुद की या दूसरों की रक्षा करेगा ये बुद्धि उसे अपने परिश्रम से ही हासिल करनी होगी।
– संजय श्रमण