भारत के वंचितों के लिए क्यों एक बड़ी धार्मिक क्रान्ति की जरूरत है?

अन्धविश्वास से सीधे नास्तिकता या नैतिकता में छलांग लगाना, भारत के वंचित और गरीब लोगों के लिए मुश्किल है। इसलिए इसतरह के विचार से उनको बचकर रहना चाहिए। यह मानना है लेखक संजय श्रमण का। वे कहते हैं कि पहले एक बड़ी धार्मिक क्रांति होनी चाहिए। तब कहीं जाकर नास्तिकता, समाजवाद और मानव गरिमा का वातावरण बन सकता है। पढ़िए उनका यह खाश आलेख।
मैं अक्सर भारत में धर्म परिवर्तन आन्दोलन की आवश्यकता के बारे में लिखता हूँ। इसपर तीन तरह के लोगों की तीन तरह की प्रतिक्रिया आती है।
(क) पहले तरह के लोग और उनकी प्रतिक्रिया
ये वे लोग हैं जिनके परिवार, गाँवों गली मुहल्लों रिश्तेदारों में पुराने शोषक धर्म के कारण बहुत सारा भेदभाव और दुःख पसरा हुआ है। ये लोग नयी रौशनी और हवा के लिए सदियों से छटपटा रहे हैं। ये लोग गरीब और वंचित तबके से आते हैं जिनके अपने मूल धर्म और संस्कृति का नाश करके इस वर्तमान शोषक धर्म का निर्माण हुआ है। 
ये वे लोग हैं जो शोषक धर्म की व्यवस्था में नुकसान उठा रहे हैं। हजारों साल से इन्हें इस व्यवस्था में कोई लाभ नहीं मिला है। इन लोगों की प्रतिक्रिया एकदम साफ़ है जो कहते हैं कि उन्हें नया मार्ग चाहिए। ये लोग जल्द ही नए मार्ग पर चलकर भारत को सभ्य और समर्थ बनाने निकल पड़ेंगे। यह सब अगले दस सालों में एक आंधी की तरह होने वाला है।

यह चित्र प्रतीकात्मक है। स्रोत - अल जज़ीरा से साभार। 







(ख) दूसरे तरह के लोग और उनकी प्रतिक्रिया
ये वे लोग हैं जो प्राचीन शोषक धर्म की व्यवस्था में लाभ उठाने वाले लोग हैं। इनका शोषण और दमन नहीं होता इन्हें लगता ही नहीं कि भारत के समाज संस्कृति और धर्म सहित भारत की नैतिकता में कोई समस्या है। ये तपाक से बोलते हैं कि भारत में कोई भेदभाव और छुआछूत नहीं है, ये पहले होता था अब नहीं है। 
ये वे लोग हैं जो कहते हैं कि भारत को नए और सभ्य धर्म की जरूरत नहीं है। ऐसा कहते हुए असल में वे अपने फायदे को बचाए रखना चाहते हैं। इसमें उनकी भी कोई गलती नहीं हर वर्ग को अपना फायदा देखने का अधिकार है। 
(ग) तीसरे तरह के लोग और उनकी प्रतिक्रिया
तीसरे लोग वे हैं जो न तो शोषक धर्म के समर्थक हैं न ही स्वयं शोषण की यांत्रिकी में सक्रिय रूप से सहयोग कर रहे हैं। बल्कि अधिकतम अवसरों पर ये स्वयं शोषक धर्म से कई ढंग से लड़ रहे हैं। इस वर्ग से अक्सर यह प्रतिक्रिया आती है कि भारत के वंचितों को नए धर्म की क्या जरूरत है? नैतिकता और कानून पालन इत्यादि ही पर्याप्त है। ये लोग धर्म को एक आवश्यक बुराई के रूप में देखते हैं और कहते हैं कि एक बीमारी छोड़कर दुसरी बीमारी देने से क्या फायदा। इस तीसरे वर्ग से जो खतरा है वह दुसरे वर्ग द्वारा पैदा किये गये खतरे से भी ज्यादा है।

अब अगली बातें और बिंदु कुछ अधिक ध्यान से समझिये।
मेरा साफ़ अनुभव है कि यह तीसरा तबका और इसकी प्रगतिशील प्रतिक्रियाएं या सलाहें ही वंचित तबके के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदायक सिद्ध होती हैं। 
इसके कुछ कारण हैं जो नीचे दे रहा हूँ:
1. ये प्रगतिशील तबका जिस समय, सुविधा और संसाधन का उपयोग करके विकसित हुआ है वह वंचितों को अगले सौ साल तक भी नहीं मिलने वाला, ऐसे में ये तीसरा तबका अपनी समझ को उन गरीबों पर सीधे सीधे लागू करना चाहता है, बगैर ये जाने कि वे स्वयं और उनका परिवार/समाज शोषक धर्म से कितना आजाद हुआ है? ये असल में ऐसा ही है कि कोई स्वस्थ आदमी बीमार को कहे कि भाई दवाई गोली की क्या जरूरत है? मुझे देखो मैं तो कोई दवाई नहीं खाता तुम भी दवाई छोड़ दो।
2. गरीब और वंचित तबके को अंध विश्वास और झाड फूंक से सीधे रेशनालिटी या नास्तिकता में ले जाने का प्रस्ताव भयानक रूप से भ्रांत और कई अवसरों पर षडयंत्र-पूर्ण है। हर समाज एक ख़ास मार्ग पर चलकर अगले मील के पत्थरों तक पहुंचता है। एक आदमी अंधविश्वास से नास्तिकता में सीधी छलांग लगा सकता है लेकिन पूरा समाज छलांग नहीं लगा सकता।
3. ये तीसरा तबका अक्सर यूरोप अमेरिका के अनुभवों का बखान करके  कहता है कि अब यूरोप में या अमेरिका में नास्तिकता का बोलबाला है और इसीलिये वे तरक्की कर रहे हैं। लेकिन हकीकत ये है कि वहां भी धर्म का काफी ताकतवर रोल है और आजकल वो बढ़ रहा है।
4. यूरोप भी अंधविश्वास से सीधे नास्तिकता या रेशनालिटी में नहीं कूद गया। वहां पुनर्जागरण और रिफोर्मेशन हुआ है। कई सदियाँ धर्मसत्ता और विज्ञान के बीच युद्ध में गुजरी हैं, लोकतंत्र ने धर्मसत्ता को सदियों तक टक्कर दी है। तब जाकर वहां नास्तिकता, समाजवाद और मानव गरिमा का वातावरण बना है। दो विश्वयुद्धों की कीमत पर आज वहां एक ख़ास तरह की सभ्यता आई है। इतनी कीमत उन्होंने चुकाई है।
5. भारत में आज तक न तो धार्मिक सुधार हुआ न पुनर्जागरण और न ही खुद की मेहनत से कोई आधुनिकता आई है। जो आई है वह भी यूरोप की साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा किये गये सांस्कृतिक बलात्कारके परिणाम में आई है। भारत ने आधुनिक इतिहास में अपनी मर्जी से सभ्य होने के लिए कोई कीमत नहीं चुकाई है। भारत ने न तो लोकतंत्र के लिए कोई आन्दोलन किया है न विज्ञान के लिए न ही धार्मिक पुनर्जागरण के लिए कुछ किया है।
6. ऐसे में भारत के गरीबों और वंचितों को पुनर्जागरण और धार्मिक सुधार या धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया में ले जाए बिना जो लोग ये कहते हैं कि सीधे नास्तिक या रेशनल हो जाओ वे लोग या इन गरीबों के लिए या तो गंभीर नहीं हैं या फिर षड्यंत्रकारी हैं।
7. जब अंधविश्वास से सीधे नास्तिकता में छलांग की सलाह दी जाती है तो असल में शोषक धर्म को ही फायदा होता है। क्योंकि पुनर्जागरण या वैचारिक परिवर्तन की लड़ाई लड़े बिना जब ये गरीब और वंचित लोग रेशनल होने की कोशिश करते भी हैं तो वहां रेश्नालिटी और क्वांटम फिसिक्स की बकवास पिलाने वाले ओशो रजनीश और जग्गी वासुदेव जैसे बाबा और दीपक चोपड़ा और अमित गोस्वामी जैसे झोलाछाप वैज्ञानिक उन्हें फिर से पुराने जाल में फसा लेते हैं। 
8. ये "सीधी छलांग लगाने वाली" तथाकथित "रेशनल पीढी" तब अंधविश्वासों और छुआछूत को क्वांटम फिजिक्स और न्यूरोसाइंस के लॉजिक से समझाने लगती है और सारा मामला गुड़ गोबर कर डालती है। ये देखकर पुराने ढंग के बाबा बड़े प्रसन्न होते हैं। क्वांटम फिजिक्स और न्यूरोसाइंस की बकवास पिलाने वाले प्रगतिशील बाबाओं का पुराने ढंग के बाबाओं से सीधा गठबंधन है बस उनके टार्गेट ग्रुप और भाषा-शैली अलग-अलग होते हैं।
9. पुराने ढंग के बाबा कर्मकांड से गरीबों अनपढ़ों को फसाते हैं और नए ढंग के फाइव स्टार बाबा अध्यात्म के जरिये वंचित तबके के अमीर और शिक्षित हिस्से को फसाते हैं। ये बाबा लोग इन दोनों तबकों को अलग-अलग जंजीरों से खींचकर उसी जहरीले शोषण भरे दलदल में वापस फेंक देते हैं।
10. इसलिए भारत के गरीबों और वंचितों को किसी भी प्रगतिशील की यह सलाह नहीं सुननी चाहिए कि अन्धविश्वास से सीधे नास्तिकता या नैतिकता या रेश्नालिटी में छलांग लग सकती है। ये एक धोखा है जिससे भारत के वंचितों और गरीबों को बचकर रहना चाहिए। भारत को एक बड़ी धार्मिक क्रान्ति की जरूरत है। नैतिकता और लोकतंत्र की समझ उधार में नहीं मिलती इसके लिए वंचित और गरीब तबके को अपने घर में गली मुहल्ले में और गाँवों से लेकर शहरों में अपने पुराने विश्वासों और जीने के ढंग को बदलने की तकलीफ से गुजरना ही होगा। 
संजय श्रमण की फेसबुक वाल से साभार