पितृसत्ता और स्त्री की कंडीशनिंग का चर्मोत्कर्ष

पितृसत्ता में क़रीने से की गई स्त्री की कंडीशनिंग का चर्मोत्कर्ष देखना हो तो, तीज-त्योहारों पर देखें। बेचारी गहने, कपड़े, मेकअप में ही उलझ कर रह गई, सुंदरता को गढ़ने में भविष्य बदसूरत कर बैठती है। ये ऐसा चक्रव्यूह है जिसमे घुसना बहुत सरल है, पर निकलना असंभव। पुरुष भी इतने से ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान, स्त्री की मूढ़ता पर मंद मंद मुस्कुराता है, और आश्वस्त हो जाता है अगले कई सदियों के लिए।

तस्वीर प्रतीकात्मक है। स्रोत: इंडियन डिफेन्स। 

बेचारी चाह कर भी इस मकड़ ज़ाल से नहीं निकल पाती, ना जाने स्वर्ग नरक के कौन कौन से डर नसों में उतार दिए जाते है, और जो निकल जाती है वो इन पितृसत्ता की द्योतक स्त्री समाज द्वारा अपमान व हिकारत का भाजन बनती है।
ये कंडीशनिंग बचपन से माँ के द्वारा ही घुट्टी की तरह पिलाई जाती है। उसका दिमाग समझ ही नहीं पाता है। क्या सही, क्या गलत और जब फर्क करने की उम्र में आती है, तब तक बहुत देर हो जाती है। कुछ इन बंधनों को तोड़ती भी है पर तोड़ते तोड़ते सारी उम्र निकल जाती है।
जब एक लड़की अपनी माँ को संघर्ष करते देखती है, तो उसमे भी वही बीज पड़ते है। जिन घरों में माँ पूरी उम्र रो कर, समझौता करके व इच्छाओं को मार कर जीती है, वहाँ उसकी लड़की में भी इसका असर देखा जा सकता है।

अधिकारों की हत्या किसी एक वर्ग की समस्या नहीं है सभी स्त्री वर्ग में सामान रूप से देखी जा सकती है। इसके रूप बदल सकते है, पर होता वही है जो सदियों से होता आ रहा हैं।
सारे पुराण स्त्री को पाप-पुण्य में फ़साने के लिए ही गढ़े गये है ऐसा प्रतीत होता है। हद होती है जब मनुस्मृति में एक ही कार्य के लिए पुरुष व स्त्री के लिए अलग अलग नियम देखने को मिलते है।
पुरुषसत्ता एक कुंठित मानसिकता है स्त्री को कमजोर समझ उस पर शासन करने की।
स्त्री तो जान ही नहीं पाती कि उसकी अपनी इच्छा या उसका अपना आनन्द किस में है। पति को खुश रखना ही उसके जीवन का ध्येय बन जाता है। ऐसा ना कर पाने में असमर्थ स्त्री आत्म ग्लानि में ही तिल-तिल कर मरती रहती है।
एक मध्यम वर्गीय स्त्री की पूरी उम्र किचन व कपड़े धोने में ही खर्च हो जाती है, और उसके बदले उसे क्या मिलता है, कुछ नहीं। यहाँ तक कि घर के निर्णयों में भी वो भागीदार नहीं बनती, "तू औरत है, मूढ़ है", जैसे शब्दों से उसका आत्मविश्वास पूरी तरह ख़त्म कर दिया जाता है। बेचारी को अपनी मर्जी से संतान पैदा करने का सुख भी नहीं मिलता। संतान कितनी होगी, कब होगी इसके लिए भी घर की और मुँह खड़े किये देखी जा सकती हैं। शादी के बाद स्त्री की स्थति बद से बदत्तर हो जाती है, रोज के लाइसेंस प्राप्त पति के द्वारा बलात्कार सहने को मजबूर आज की प्रगतिशील नारी।
एक समय बाद वो स्त्री ना हो कर पुरुष सत्ता में सहयोग करने वाली मजदूरों की बस्ती बन जाती है। ऐसी स्त्री को पितृसत्ता के द्वारा नवाज़ा भी जाता है। ये बोल कर कि 'तुम आदर्श हो पूरी नारी जाती की, संस्कारों की जीती जागती मिसाल हो।" रिवॉर्ड मिलता है अच्छी औरत का।
वो इनमें ही अपना सर्वश्व खोजती है और इसी झूठे भ्रम में ताउम्र जीती है और अगली पीढ़ी के रूप में अपनी ही संतान की कंडीशनिंग करती है। जब आप के विरोध की रीढ़ की हड्डी ही बचपन में तोड़ दी जाती है तो आप कैसे उस रीढ़ विहीन स्त्री समाज से अपेक्षा रखोगे कि वो अपनी आने वाली पीढ़ी को सुधार सकेगी। उसे तो यही सिखाया जाता है कि सेवा ही तेरा धर्म है, यही तेरा जीवन है। वो कभी नहीं जान पाती कि उसके होने का सही अर्थ किसमें है।
सारी स्त्री जाति इससे अछूती नहीं है सब पर प्रभाव है। किसी पर कम, किसी पर ज्यादा। मध्यम परिवार की स्त्रियां तो इससे भयंकर रूप से ग्रसित हैं। मै भी कोई अछूती नहीं हूँ इनसे, क्योंकि मेरी भी परवरिश इसी मौहाल में हुई है। ये दीगर है कि इन्हें तोडना सीख गई हूं।
ठीक इसके विपरीत आचरण व विचारों वाली स्त्री पितृसत्ता के लिए ख़तरा बन जाती है, पितृसत्ता में सेंध लगाती। ये आवारा स्त्रियां इसके कारण, तरह तरह से प्रताड़ित की जाती हैं और घोर कलयुग की घोतक कहलाती हैं। सामाजिक रूप से बहिष्कार तक की जाती है।
अरे कैसा पति है इसका! इस आवारा पशु रूपी स्त्री को नियंत्रण में नहीं रख सकता! खुले आम घूम रही है और समाज का मौहाल ख़राब कर रही है! इन्हें कोई मर्यादा सिखाये कि समाज में मर्दो के सामने कैसे रहा जाता है!
लिखती हो! हां! ...अच्छा ही लिख लेती हो! ..पर जरा मर्यादा का ख़्याल रखा करो! हम कुछ बोल नहीं रहे इसका मतलब ये नहीं की कुछ भी लिखती जाओ! ज़रूरत पड़ने पर तुमको तुम्हारी औकात का ज्ञान करा दिया जायेगा समझी!
बहुत गहरे तक गड़ी है पितृसत्ता की जडें।
गीत, फेसबुक से साभार