आज ज़रूरत धर्म की नहीं, बल्कि नैतिकता की है

समाज की पुनर्रचना, नियमन और उसके विकास तथा बेहतरी के लिए मानवता को किसी धर्म की अनिवार्यता नहीं रह गयी है। जो जरुरी है, वह है नैतिकता की। किसी काल में जब इंसानों की प्रवृति जानवरों जैसी थी और उसके नियमन हेतु किसी कारण की आवश्यकता थी, तब बेशक धर्म ने डर, लोभ, अज्ञानता पर आधारित एक प्रणाली बनायीं। उसे रहस्यमयी, चमत्कारपूर्ण और सबसे बड़ा उद्देश्य बनाया हो, पर आज जरूरतें बदल गई हैं।

तस्वीर प्रतीकात्मक मात्र है। 
धर्म है कि बदलने को राजी नहीं है. वही हजारों साल पुराने नियमों और पैगम्बरों के जीवन से चिपका हुआ है। तब युद्ध में लोग मारे जाते थे, पुरुषों की संख्या कम थी। तब लड़की से शादी करना अच्छा समझा जाता था, क्योंकि तब भी महिलायें ही बच्चों की परवरिश करती थी। युद्ध में पुरुषों के मारे जाने से लड़कियाँ अधिक और लडके कम थे। ऐसे में लोग लड़कों की कामना करते हो सकते हैं। लेकिन आज भी लोग उसी नियम को सत्य मान बैठे हैं, इससे दिक्कत पैदा होगी।
ऐसे भी पागल लोग हैं जो समझते हैं कि बिना धर्म ईश्वर को माने, नैतिक रूप से अच्छा इन्सान हो सकता है, इसे मानने को तैयार नहीं हैं। उन्हें नहीं समझ है कि धर्म और नैतिकता अलग अलग चीज है। आज के परिदृश्य में धर्म जोड़ता नहीं, बल्कि तोड़ता है। द्वेष और भेदभाव पैदा करता है। नैतिकता हममें सामाजिक चेतना, करुणा और सदाशयता पैदा करती है, जो मानवता का आधार है।